"मैं कहां लिख सकता हूँ,सच मैं तो लिखने से डरता हूँ, लिखने से डर इसलिए लगता हैं कि एक शब्द ही कई दीवारों को तोड़ सकता है, इसलिए केवल लिखने का प्रयास करता हूँ, थोड़ा अभ्यास करता हूँ,हम तभी अच्छा लिख पायेगें, जब हमारी कल्पना शक्ति कल्पना के आगे निकल जाये, और यह तभी होगा जब हम समाज की ओर ताकेगे, समाज में हम रहते हैं, इसलिए समाज से ही हमे कहानियां भी मिलती रहेगी, और इन कहानियों को सहारा देगी, हमारी कल्पना, इस तरह मैंने समाज और कल्पना को मिलाकर कुछ कहने की कोशिश की है, चलचित्र पटकथा पर कथा को पूर्ण करता है, सच कहूं मैंने भी अपनी कहानियों में पटकथा को रखा है,जिससे कुछ नया हो साहित्य मे, और पढ़ने वालों के आंखों में दृश्य उभरने लगे, यही मैंने अपने आंखों से लिखने को कहां था, आपकी कसम धन्यवाद!
-सारथी कुमार"
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