"नियति अटल है जिसे होना ही है। हम चाहे या न चाहे। हमारी इच्छा अनिच्छा के सरोकार के परे जो घटित होता है वो वर्तमान है। नियति है। घटित घटना क्रम से उत्पन्न परिस्थितियों में किया गया कर्म भाग्य बन जाता है।
माया द डेस्टिनी कहानी की दोनो नायिकाओं की जीवन शैली बिल्कुल एक दूसरे के विपरीत है। नियति के चलते दोनो का मिलना ओर एक दूसरे के जीवन की धूप-छांव के पेहलू पर समानता। या यूं कहा जाए की र्दद ने र्दद को पुकारा। जीवन की धूरी पर, दो विपरीत बिंदुओं पर एक जैसा ही सहते दो साये संवाद ओर मन के भवंर में एक दूसरे के करीब आ गए, इतने करीब की नियति उनका भाग्य बन कर सामने आ गया।
नियति ओर भाग्य के इस खेल के केंद्र में इन दोनो नायिकाओं को एक दूसरे से मिलाने बाला सुत्रधार था, आरज़ू। इस कहानी का तीसरा चरित्र। जो नियति की पटकथा के हर मोड पर घटने बाली हर घटना का साक्षी था। कहानी के अंत में नियति के समक्ष की गई प्रतिक्रिया रहस्यमय भाग्य के रुप में सामने आती है।"