जीवन की सहज अनुभूतियाँ जब आत्मा की गहराइयों से फूटती हैं, तब वे कविता बन जाती हैं—कभी कुसुमों-सी कोमल, तो कभी कंटकों-सी चुभन लिए। डॉo ज्ञानेन्द्र पाण्डेय की यह काव्य-कृति "आत्मा की गहराइयों से : कुसुमों से कंटक तक" उसी संवेदनशील यात्रा का आत्मस्वर है, जिसमें प्रेम, विरह, आत्ममंथन, सामाजिक विवेक, ग्रामीण स्पर्श और जीवन की नमी—सभी कुछ समाहित हैं। इन कविताओं में कहीं 'भीगती चंपा की ज्यों सांस' की कोमलता है, तो कहीं 'रोटी की थरिया में, आंधी की धूल' की विवश यथार्थ-झांकी। आत्मा की अतल गहराइयों से फूटती 'आत्मा से उठती आराधना' जैसे पद जीवन के ऊर्ध्वगामी बिंदु को छूते हैं। वहीं कहीं एक भारतीय पत्नी अपने पति से युद्ध की चुनौती में कह उठती है — 'काटि लाओ दुसमन को करेजा, तबहीं करौंगी बतियां' — यह हुंकार कवि की रचनात्मक विविधता और सामाजिक गहराई दोनों को एक साथ प्रतिध्वनित करती है। हर कविता एक पड़ाव है—कहीं हृदय की प्यास है, कहीं संघर्ष की चिंगारी, कहीं विश्वास की लौ, तो कहीं असमाप्त प्रश्नों की प्रतिध्वनि। सरल, प्रवाहमयी भाषा में रचे गए ये पद्य जीवन के हर पाठक को अपने किसी न किसी क्षण का सजीव रूपांतरण प्रतीत होंगे। यह संग्रह एक भावनात्मक संवाद है—लेखक की आत्मा और पाठक के हृदय के बीच।
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Atma ki Gahraiyon se: Kusumon se Kantak tak / आत्मा की गहराइयों से: कुसुमों से कंटक तक
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