वो, जो कभी कहीं अचानक मिल जाती है, किसी पार्क में,
सोसायटी की किसी बैंच पर, फ़व्वारे के किनारे लगी सीट पर ।
वो, जो न जाने किस भावावेश में आकर साझा कर लेती है,
अपनी व्यथा, अपने मन के कोने में छुपा कोई सुख-दु:ख
और हल्का कर लेती है अपना मन।
वो, छूना चाहती है, आकाश के इन्द्रधनुष को,
देखना चाहती है, चाँदनी रात में “दूधिया से चाँद” को,
वो, जो बांधना चाहती है,
ढेर सारे “चाहत के फूल” अपने गुलाबी आँचल में ।
वही है नायिका, इस प्रस्तुति की...
“वो, कुछ जानी, कुछ अनजानी”